पातंजल योगसूत्र में चित्तवृत्ति निरोध का सैद्धांतिक विश्लेषण
Keywords:
पातंजल योगसूत्र, चित्तवृत्ति, निरोध, अभ्यास, वैराग्य, अष्टांगयोग, समाधि, पुरुष, प्रकृति, व्यासभाष्यAbstract
प्रस्तुत शोधपत्र महर्षि पतंजलि द्वारा रचित योगसूत्र में वर्णित "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः" इस मूल सूत्र के दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक तथा साधनात्मक आयामों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन चित्त की संरचना, वृत्तियों के स्वरूप, उनके क्लिष्ट एवं अक्लिष्ट भेद, तथा निरोध की प्रक्रिया को अभ्यास एवं वैराग्य के माध्यम से समझने का प्रयत्न करता है। साथ ही अष्टांग योग की भूमिका, समाधि की विभिन्न अवस्थाओं तथा ईश्वरप्रणिधान के महत्व की भी विवेचना की गई है। व्यासभाष्य, वाचस्पति मिश्र की तत्त्ववैशारदी, विज्ञानभिक्षु की योगवार्तिक जैसी परम्परागत टीकाओं के साथ-साथ स्वामी विवेकानंद एवं अन्य आधुनिक व्याख्याकारों के दृष्टिकोणों का भी समावेश किया गया है। यह पत्र स्थापित करता है कि चित्तवृत्ति निरोध केवल मानसिक क्रियाओं का दमन नहीं अपितु चित्त की स्वाभाविक चंचलता को समाहित कर पुरुष के स्वरूप में स्थिति प्राप्त करने की एक क्रमबद्ध, वैज्ञानिक साधना-पद्धति है।











