वैशेषिक दर्शन में पदार्थ और द्रव्य की अवधारणा: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
Keywords:
वैशेषिक दर्शन, पदार्थ, द्रव्य, कणाद, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, अभाव, प्रशस्तपाद, पदार्थ-मीमांसाAbstract
भारतीय दर्शन की षड्दर्शन परम्परा में वैशेषिक दर्शन का विशिष्ट स्थान है। महर्षि कणाद द्वारा प्रणीत यह दर्शन मुख्यतः तत्त्वमीमांसा (Metaphysics) अथवा पदार्थ-विज्ञान पर आधारित है। वैशेषिक सूत्रकार कणाद ने सम्पूर्ण जगत् को छः अथवा सात पदार्थों में विभाजित किया है — द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय तथा (परवर्ती आचार्यों द्वारा स्वीकृत) अभाव। इन सप्त पदार्थों में द्रव्य को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है, क्योंकि शेष सभी पदार्थ किसी न किसी रूप में द्रव्य पर आश्रित हैं अथवा द्रव्य के माध्यम से ही अपनी सत्ता को प्रकट करते हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र में वैशेषिक दर्शन की पदार्थ-मीमांसा तथा द्रव्य-सिद्धान्त का गम्भीर विश्लेषण किया गया है। इसमें पदार्थ की परिभाषा, वर्गीकरण, प्रत्येक पदार्थ के लक्षण, नौ द्रव्यों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक्, आत्मा तथा मनस्) का सांगोपांग विवेचन, द्रव्य और गुण-कर्म के पारस्परिक सम्बन्ध, समवाय-सिद्धान्त, तथा न्याय-वैशेषिक की समन्वित परम्परा में पदार्थ-मीमांसा के विकास का ऐतिहासिक अनुशीलन प्रस्तुत किया गया है। साथ ही इस अध्ययन में वैशेषिक के पदार्थ-सिद्धान्त की तुलना सांख्य, न्याय तथा वेदान्त दर्शन की तत्त्व-मीमांसा से भी की गई है, जिससे भारतीय दर्शन की तात्त्विक चिन्तन-परम्परा में वैशेषिक के अवदान को समुचित रूप से समझा जा सके। यह अध्ययन प्रमाणतः मौलिक ग्रन्थों — वैशेषिकसूत्र, प्रशस्तपादभाष्य, तर्कसंग्रह, न्यायकन्दली, किरणावली तथा उपस्कार आदि — पर आधारित है, साथ ही आधुनिक भारतीय दार्शनिकों के मन्तव्यों को भी समाहित किया गया है।











