मीमांसा दर्शन में धर्म और वेद-प्रामाण्य का सिद्धांत
Keywords:
मीमांसा दर्शन, धर्म, वेद-प्रामाण्य, अपौरुषेयवाद, चोदनालक्षण, शब्द-प्रमाण, स्वतःप्रामाण्यवाद, जैमिनि, कुमारिल भट्ट, प्रभाकर मिश्रAbstract
भारतीय दर्शन-परम्परा में मीमांसा दर्शन का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह दर्शन मुख्यतः वैदिक कर्मकाण्ड की व्याख्या, धर्म के स्वरूप-निर्धारण तथा वेद की प्रामाणिकता की दार्शनिक प्रतिष्ठा से सम्बद्ध है। प्रस्तुत शोध-पत्र में मीमांसा दर्शन के दो केन्द्रीय सिद्धान्तों—धर्म-मीमांसा एवं वेद-प्रामाण्य—का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। जैमिनि के मीमांसासूत्र से प्रारम्भ होकर शबरस्वामी के भाष्य, तथा कुमारिल भट्ट एवं प्रभाकर मिश्र की व्याख्याओं तक की परम्परा का अनुशीलन करते हुए यह दिखाया गया है कि मीमांसकों ने धर्म को "चोदनालक्षण" अर्थात् वैदिक विधि-वाक्यों द्वारा प्रेरित कर्तव्य के रूप में परिभाषित किया। साथ ही वेद को अपौरुषेय (अकर्तृक) मानकर उसकी नित्यता तथा स्वतःप्रामाण्य (स्वतः प्रामाण्यवाद) की स्थापना की गयी। यह शोध-पत्र शब्द-प्रमाण की प्रामाणिकता, अपौरुषेयतावाद के तार्किक आधार, कुमारिल एवं प्रभाकर सम्प्रदायों के भेद, तथा न्याय-वैशेषिक एवं बौद्ध दर्शन से मीमांसा के वेद-प्रामाण्य-सिद्धान्त की तुलना करते हुए इसकी दार्शनिक सुदृढ़ता और सीमाओं का समालोचनात्मक मूल्यांकन करता है। निष्कर्षतः यह स्पष्ट होता है कि मीमांसा दर्शन का धर्म-सिद्धान्त और वेद-प्रामाण्यवाद केवल धार्मिक आस्था का विषय न होकर एक सुसंगत ज्ञानमीमांसीय (epistemological) संरचना पर आधारित है, जिसने भारतीय दर्शन को प्रमाण-सिद्धान्त की दृष्टि से समृद्ध किया।











