संस्कृत काव्यशास्त्र में अलंकार और रीति सम्प्रदायों का तात्त्विक विवेचन
Keywords:
काव्यशास्त्र, अलंकार सम्प्रदाय, रीति सम्प्रदाय, भामह, दण्डी, वामन, गुण, रस, ध्वनि, वक्रोक्तिAbstract
संस्कृत काव्यशास्त्र भारतीय सौन्दर्यशास्त्रीय चिन्तन की एक समृद्ध एवं बहुआयामी परम्परा है, जिसमें काव्य के आत्मतत्त्व को लेकर अनेक सम्प्रदायों का उद्भव हुआ। इनमें अलंकार सम्प्रदाय और रीति सम्प्रदाय ऐतिहासिक दृष्टि से सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रभावशाली माने जाते हैं। अलंकार सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य भरतमुनि तथा भामह हैं, जिन्होंने काव्य-सौन्दर्य का मूल कारण अलंकार को माना। इसके विपरीत, आचार्य वामन द्वारा प्रवर्तित रीति सम्प्रदाय ने काव्य की आत्मा रीति अर्थात् पदरचना की विशिष्ट शैली को घोषित किया। प्रस्तुत शोध-पत्र इन दोनों सम्प्रदायों के तात्त्विक स्वरूप, ऐतिहासिक विकास, प्रमुख आचार्यों के मन्तव्यों, पारस्परिक साम्य-वैषम्य तथा उत्तरवर्ती काव्यशास्त्रीय परम्पराओं—विशेषतः ध्वनि एवं वक्रोक्ति सम्प्रदायों—पर उनके प्रभाव का समालोचनात्मक विवेचन प्रस्तुत करता है। शोध की पद्धति विश्लेषणात्मक एवं तुलनात्मक है, जिसमें मूल संस्कृत ग्रन्थों—नाट्यशास्त्र, काव्यालंकार, काव्यादर्श, काव्यालंकारसूत्रवृत्ति, ध्वन्यालोक, काव्यप्रकाश आदि—के आधार पर सिद्धान्तों की प्रामाणिक व्याख्या की गई है। निष्कर्षतः यह स्पष्ट होता है कि अलंकार और रीति दोनों सम्प्रदाय, यद्यपि परस्पर प्रतिस्पर्धी प्रतीत होते हैं, वस्तुतः काव्य-सौन्दर्य की समग्र अवधारणा के दो पूरक आयाम हैं, जिन्होंने आगे चलकर रस, ध्वनि और वक्रोक्ति जैसे परिष्कृत सिद्धान्तों की भूमि तैयार की।











