संस्कृत नाट्यशास्त्र में रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया
Keywords:
रस-निष्पत्ति, नाट्यशास्त्र, भरतमुनि, अभिनवगुप्त, स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव, व्यभिचारीभाव, साधारणीकरण, अभिव्यक्तिवाद, भारतीय काव्यशास्त्रAbstract
भारतीय काव्यशास्त्र और नाट्यशास्त्र की परम्परा में "रस" की अवधारणा केन्द्रीय स्थान रखती है। आचार्य भरतमुनि द्वारा प्रणीत नाट्यशास्त्र में प्रतिपादित रससूत्र — "विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः" — भारतीय सौन्दर्यशास्त्र का मूलाधार माना जाता है। यह शोध-पत्र रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें भट्टलोल्लट के उत्पत्तिवाद, शंकुक के अनुमितिवाद, भट्टनायक के भुक्तिवाद तथा अभिनवगुप्त के अभिव्यक्तिवाद जैसे प्रमुख सिद्धान्तों की तुलनात्मक विवेचना की गई है। इसके साथ ही विभाव, अनुभाव और व्यभिचारीभाव के पारस्परिक सम्बन्ध, साधारणीकरण की प्रक्रिया, तथा नवरसों के स्वरूप का विस्तृत अध्ययन किया गया है। शोध का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि किस प्रकार नाट्य-प्रदर्शन के माध्यम से सामाजिक (दर्शक) के हृदय में स्थायीभाव रस के रूप में परिणत होता है और यह अनुभूति लौकिक अनुभूतियों से किस प्रकार भिन्न है। अध्ययन में प्राथमिक स्रोत के रूप में नाट्यशास्त्र, अभिनवभारती, काव्यप्रकाश, साहित्यदर्पण तथा दशरूपक जैसे मौलिक ग्रन्थों का उपयोग किया गया है, साथ ही आधुनिक हिन्दी विद्वानों के समीक्षात्मक ग्रन्थों का भी सन्दर्भ लिया गया है। निष्कर्षतः यह प्रतिपादित किया गया है कि रस-निष्पत्ति केवल एक साहित्यिक प्रक्रिया न होकर एक मनोवैज्ञानिक-आध्यात्मिक अनुभूति है, जो नाट्य को लोकोत्तर आनन्द का माध्यम बनाती है।











