मेघदूत में विरह-वेदना और प्रकृति के मानवीकरण की काव्य-कला
Keywords:
मेघदूतम्, कालिदास, विरह-वेदना, विप्रलम्भ श्रृंगार, प्रकृति-मानवीकरण, दूतकाव्य, रस-सिद्धान्त, यक्ष, अलकापुरी, उद्दीपन विभावAbstract
महाकवि कालिदास कृत मेघदूतम् संस्कृत साहित्य का वह अप्रतिम खण्डकाव्य है जिसने विश्व-साहित्य में दूतकाव्य (Messenger-poem) की एक सर्वथा मौलिक परम्परा का सूत्रपात किया। यह शोध दो परस्पर गुम्फित काव्यगत उपकरणों—विरह-वेदना (वियोग-जनित मनोवैज्ञानिक पीड़ा) तथा प्रकृति का मानवीकरण (Personification of Nature)—के अन्तर्सम्बन्ध का विश्लेषण करता है। यक्ष अपनी प्रिया से एक वर्ष के लिए पृथक् होकर रामगिरि के आश्रमों में शापित जीवन व्यतीत करता है, और अपनी असहनीय वेदना को अभिव्यक्त करने के लिए वह एक जड़ मेघ को चेतन सखा, दूत और सन्देशवाहक के रूप में प्रतिष्ठित कर देता है। यह अध्ययन दर्शाता है कि कालिदास के काव्य में मानवीकरण केवल अलंकार-प्रयोग नहीं, अपितु विरह की असह्य अनुभूति को वस्तुनिष्ठ रूप देने (Objective Correlative) की एक गहन काव्य-युक्ति है। शोध में भरतमुनि के रस-सिद्धान्त, विशेषतः विप्रलम्भ श्रृंगार के सैद्धान्तिक ढाँचे में मेघदूत के प्रमुख श्लोकों का विश्लेषण किया गया है, तथा यह स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि कालिदास की प्रकृति-चेतना भारतीय वैदिक-औपनिषदिक चिन्तन परम्परा से किस प्रकार प्रभावित है। अध्ययन की पद्धति गुणात्मक, वर्णनात्मक तथा पाठ-केन्द्रित (Text-centric) आलोचनात्मक विश्लेषण पर आधारित है।











