कुमारसंभव में शिव-पार्वती विवाह प्रसंग की काव्यात्मक सौष्ठव
Keywords:
कुमारसंभव, कालिदास, शिव-पार्वती विवाह, काव्य-सौष्ठव, अलंकार, रस-सिद्धांत, प्रकृति-चित्रण, संस्कृत महाकाव्यAbstract
महाकवि कालिदास द्वारा रचित महाकाव्य कुमारसंभव संस्कृत साहित्य के सर्वोच्च शिखरों में से एक माना जाता है। इस महाकाव्य का केंद्रीय प्रसंग शिव-पार्वती के विवाह की कथा है, जो पंचम सर्ग से लेकर अष्टम सर्ग तक विस्तारित है। प्रस्तुत शोध-पत्र में इस विवाह-प्रसंग की काव्यात्मक सौष्ठव अर्थात् उसकी सौंदर्यात्मक, अलंकारिक, रसात्मक तथा शैलीगत विशेषताओं का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। अध्ययन में कालिदास की उपमा-योजना, प्रकृति-चित्रण, छंद-वैविध्य, रस-निष्पत्ति तथा सांस्कृतिक-दार्शनिक गहराई को केंद्र में रखते हुए यह दर्शाने का प्रयत्न किया गया है कि किस प्रकार कालिदास ने एक पौराणिक कथा को उदात्त काव्य-कला के माध्यम से शाश्वत सौंदर्य प्रदान किया है। शोध में तपस्या, कामदहन, हिमालय-गमन, विवाह-वर्णन तथा प्रकृति एवं मानव-भावों के अद्वैत को विशेष रूप से विश्लेषित किया गया है। साथ ही आचार्य मल्लिनाथ की टीका, हजारीप्रसाद द्विवेदी, बलदेव उपाध्याय, रामचंद्र शुक्ल आदि विद्वानों के मतों का भी समावेश किया गया है। निष्कर्षतः यह स्पष्ट होता है कि कुमारसंभव का विवाह-प्रसंग भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपरा में शृंगार, वीर तथा शांत रसों के सुंदर सामंजस्य का अनुपम उदाहरण है।











