मनुस्मृति में वर्णाश्रम व्यवस्था का दार्शनिक आधार
Keywords:
मनुस्मृति, वर्णाश्रम व्यवस्था, धर्मशास्त्र, गुण-कर्म-विभाग, पुरुषार्थ, स्वधर्म, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र, आश्रम-व्यवस्था, हिन्दू सामाजिक दर्शन, न्याय एवं समताAbstract
प्रस्तुत शोध-पत्र मनुस्मृति में प्रतिपादित वर्णाश्रम व्यवस्था के दार्शनिक आधारों की गहन विवेचना प्रस्तुत करता है। भारतीय सामाजिक चिन्तन की परम्परा में वर्णाश्रम व्यवस्था को केवल एक सामाजिक विभाजन के रूप में नहीं, अपितु एक व्यापक ब्रह्माण्डीय, आध्यात्मिक तथा नैतिक व्यवस्था के रूप में देखा गया है, जिसका मूल उद्देश्य व्यक्ति तथा समाज दोनों के धारण, पोषण एवं उन्नयन में निहित है। यह अध्ययन गुण-कर्म-विभाग के सिद्धान्त, पुरुषार्थ-चतुष्टय की अवधारणा, धर्म की तात्त्विक व्याख्या, तथा सृष्टि-प्रक्रिया के पौराणिक-दार्शनिक विवरण के आधार पर वर्णाश्रम व्यवस्था की तार्किक संरचना का विश्लेषण करता है। साथ ही यह शोध-पत्र वर्णाश्रम व्यवस्था की ऐतिहासिक विकृतियों, जन्माधारित व्याख्या की समस्याओं, तथा आधुनिक सामाजिक-न्याय-चिन्तकों द्वारा की गई आलोचनाओं की भी समीक्षा करता है। अन्ततः यह अध्ययन यह स्थापित करने का प्रयास करता है कि मनु द्वारा प्रस्तुत मूल दार्शनिक ढाँचा गुण एवं स्वभाव पर आधारित था, किन्तु कालान्तर में इसकी सामाजिक व्याख्या जन्माधारित तथा स्तरीकृत होती गई, जिसके फलस्वरूप यह व्यवस्था अपने मूल दार्शनिक उद्देश्य से विचलित हो गई। यह शोध-पत्र प्राथमिक स्रोत के रूप में मनुस्मृति के मूल श्लोकों तथा द्वितीयक स्रोतों के रूप में भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों के आलोचनात्मक अध्ययनों का उपयोग करते हुए एक समग्र एवं संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है।











