तैत्तिरीय उपनिषद में आनंदमीमांसा का अध्ययन
Keywords:
तैत्तिरीय उपनिषद, आनंदमीमांसा, आनंदवल्ली, भृगुवल्ली, पंचकोश, ब्रह्मानंद, अद्वैत वेदांत, शांकरभाष्य, मानुष आनंद, रसो वै सःAbstract
प्रस्तुत शोधपत्र में तैत्तिरीय उपनिषद के अंतर्गत वर्णित "आनंदमीमांसा" (आनंद की व्याख्या एवं गणना-पद्धति) का गहन दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। तैत्तिरीय उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से संबंधित है और इसे तीन वल्लियों—शीक्षावल्ली, आनंदवल्ली तथा भृगुवल्ली—में विभाजित किया गया है। इनमें आनंदवल्ली तथा भृगुवल्ली में क्रमशः पंचकोश सिद्धांत तथा आनंद की मात्रात्मक गणना का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। उपनिषद के अनुसार ब्रह्म स्वयं आनंदस्वरूप है—"आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्" (तैत्तिरीय उपनिषद, भृगुवल्ली ६.१)—तथा समस्त प्राणी उसी आनंद से उत्पन्न होकर, उसी में जीवन धारण कर, अंततः उसी में लीन हो जाते हैं। इस शोधपत्र में आनंदमीमांसा के दार्शनिक स्वरूप, पंचकोश-सिद्धांत के साथ उसके संबंध, मानुष आनंद से लेकर ब्रह्मानंद तक की शतगुणोत्तर गणना-पद्धति, आचार्य शंकर एवं अन्य वेदांताचार्यों की व्याख्याओं, तथा आधुनिक विद्वानों के दृष्टिकोण का समालोचनात्मक विवेचन किया गया है। शोध का निष्कर्ष यह दर्शाता है कि आनंदमीमांसा केवल एक दार्शनिक कल्पना नहीं अपितु अद्वैत वेदांत की उस मूल स्थापना का प्रतीक है कि आनंद ब्रह्म का स्वरूपभूत लक्षण है, तथा जीव का परम पुरुषार्थ उसी आनंदस्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति है।











