अभिज्ञानशाकुन्तलम् में प्रेम और विरह के भावों का चित्रण: एक साहित्यिक-सौन्दर्यशास्त्रीय अध्ययन
Keywords:
अभिज्ञानशाकुन्तलम्, कालिदास, शृंगार रस, संयोग, वियोग/विप्रलम्भ, दुष्यन्त-शकुन्तला, दुर्वासा शाप, नाट्यशास्त्र, ध्वनि सिद्धान्त, संस्कृत नाटकAbstract
महाकवि कालिदास द्वारा विरचित अभिज्ञानशाकुन्तलम् संस्कृत साहित्य का वह अनुपम रत्न है जिसमें मानवीय हृदय की सबसे कोमल और सबसे गहन अनुभूतियों—प्रेम और विरह—का अत्यन्त सूक्ष्म तथा मार्मिक चित्रण हुआ है। यह शोध-पत्र इस नाटक में निहित शृंगार रस के दोनों पक्षों—संयोग शृंगार और वियोग (विप्रलम्भ) शृंगार—का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। अध्ययन का उद्देश्य यह दर्शाना है कि किस प्रकार कालिदास ने प्रकृति-चित्रण, संवाद-योजना, नाट्य-तकनीक तथा भारतीय काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तों (विशेषतः रस-सिद्धान्त और ध्वनि-सिद्धान्त) का प्रयोग करते हुए दुष्यन्त और शकुन्तला के प्रेम-सम्बन्ध को प्रारम्भिक आकर्षण से लेकर विवाह, विस्मृति-जनित विरह, और अन्ततः पुनर्मिलन तक विकसित किया है। शोध-पत्र में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि दुर्वासा के शाप की नाट्ययुक्ति केवल कथानक को गति देने का साधन नहीं, अपितु मानवीय स्मृति, विस्मृति और आत्म-पहचान के दार्शनिक प्रश्नों को उठाने का माध्यम भी है। साथ ही, महाभारत के शकुन्तलोपाख्यान से कालिदास के नाट्य-रूपान्तरण की तुलना करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि कालिदास ने मूल कथा में करुणा और वियोग के तत्त्वों को किस प्रकार अधिक प्रभावी और मार्मिक बनाया। अध्ययन में भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, आनन्दवर्धन के ध्वन्यालोक, तथा अभिनवगुप्त की रस-मीमांसा के आलोक में नाटक के प्रमुख प्रसंगों—शकुन्तला-दर्शन, गान्धर्व-विवाह, कण्व का विदाई-प्रसंग, दुष्यन्त का विस्मरण, और अन्तिम मिलन—का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।











